गुप्त काल (लगभग 320-550 ई.) भारत का स्वर्ण युग था, जिसमें आर्यभट्ट और वराहमिहिर जैसी वैज्ञानिक प्रतिभाओं ने गणित, खगोल विज्ञान और अन्य क्षेत्रों में क्रांतिकारी योगदान दिए, जिनका प्रभाव विश्व स्तर पर पड़ा। आर्यभट्ट से वराहमिहिर तक: गुप्त काल की वैज्ञानिक प्रतिभा जिसने दुनिया बदल दी जब हम गुप्त काल को “भारत का स्वर्ण युग” कहते हैं, तो यह केवल राजनीतिक स्थिरता या सांस्कृतिक उत्कर्ष के कारण नहीं है। यह वह समय था जब भारत ने विज्ञान, गणित और खगोलशास्त्र में ऐसे सिद्धांत दिए, जिन्होंने न केवल उस युग को बल्कि आने वाली सदियों को दिशा दी। आर्यभट्ट से लेकर वराहमिहिर तक की वैज्ञानिक यात्रा केवल गणना या ग्रह-नक्षत्रों की कहानी नहीं है; यह मानव बुद्धि की उस उड़ान की कहानी है जिसने “शून्य” को अर्थ दिया और ब्रह्मांड को गणितीय रूप में समझने का साहस किया। 1. गुप्त काल: वैज्ञानिक उन्नति की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (क) राजनीतिक स्थिरता और संरक्षण गुप्त शासकों—विशेषकर चंद्रगुप्त द्वितीय और कुमारगुप्त—ने शिक्षा और विद्या को संरक्षण दिया। नालंदा और तक्षशिला जैसे केंद्रों ने ज्ञान-विनिमय को संस्थागत स्वरूप दिय...